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विचार: असीमित संभावनाओं वाली मैत्री

Jindal School of International Affairs

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श्रीराम चौलिया। मुंबई में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों की जागिंग केवल एक प्रमुख राष्ट्राध्यक्ष की कसरती कवायद न होकर भारत-फ्रांस संबंधों की गतिशीलता का भी प्रतीक रही। इन दो सदाबहार मित्र देशों के रिश्ते निरंतर प्रगाढ़ होते जा रहे हैं। द्विपक्षीय रणनीतिक साझेदारी को ‘विशेष वैश्विक रणनीतिक साझेदारी’ का नया दर्जा दिया जाना ही दर्शाता है कि पेरिस और नई दिल्ली के बीच तालमेल कितना व्यापक और बहुआयामी होता जा रहा है। दोनों देशों के रिश्ते समय की हर कसौटी पर खरे उतरे हैं। इसके पीछे मुख्य कारण है विदेश नीति में रणनीतिक स्वायत्तता को प्राथमिकता देना।

यहां तक कि शीत युद्ध के दौरान जब पश्चिमी देशों ने गुटनिरपेक्ष भारत के प्रति शंकालु रवैया रखते हुए उपेक्षा की नीति अपनाई थी, तब भी फ्रांस नाटो के अन्य सदस्यों के मुकाबले भारत के प्रति सहिष्णुता रखता था, क्योंकि फ्रांस अमेरिका के दबाव में रहकर निर्णय नहीं लेना चाहता था। भारत द्वारा 1998 में परमाणु परीक्षण के बाद फ्रांस इकलौती पश्चिमी शक्ति थी, जिसने नई दिल्ली पर आर्थिक प्रतिबंध नहीं लगाए थे। इतना ही नहीं, उसने परमाणु ऊर्जा सहयोग में भी कोई कमी भी नहीं आने दी थी।

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Published Date 18-02-2026
Category News